Budhi Maa। बूढ़ी माँ। हिंदी कहानी

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पता नहीं वह कौन थी? अक्सर आंगन में तुलसी के छोटी पौधों में पानी डालकर मेरी लंबी उम्र की कामना करती रहती थी।
घर की कई जिम्मेदारियों के बावजूद अलग से मेरे लिए समय निकाल ही लेती थी। हमेशा वो मुझे लाडला कह कर बुलाती थी । लेकिन यह बातें मेरी समझ से परे थी क्योंकि वो बिना अपनी परवाह किए मेरी परवाह किया करती थी ।

जब रातों में मेरा शरीर बुखार से तपती थी तो शरीर का वाष्प उस औरत की आंखों से बाहर पानी बनकर निकलती थी ।
जब मेरी उम्र कुछ दिन की थी तब मैं समझ चुका था यह जरूर कोई ईश्वर की दूत हैं जो मेरी रक्षा के लिए आई हो।

उसे अपने पास बैठा देख घर में हमेशा उससे कुछ बोलना चाहता था लेकिन वह मेरी बात को बिना आवाज के ही सब कुछ समझ लेती थी ।

एक दिन जब मैं पहली बार अपनी जुबान से संघर्ष कर “मां ” बोला तो वह खुशी से फुली समा रही थी ।
मेरी पहली बोली सुन कर उसे ऐसा लगा जैसे संसार की सारी खुशियां ईश्वर उसकी झोली में डाल दी हो। अब मुझे समझ आ चुकी थी यह मेरी मां है , मैं उसके अंगुलियों को पकड़कर धीरे- धीरे कदमों से धरती नापना सीखा ।

जब मेरा पैर जमीं पैर लड़खड़ाती थी तो वह अपने हाथों से पकड़कर मुझे आगे बढ़ा देती थी । मां ने अपनी हर खुशियों को त्यागकर मेरी खुशियों का परवाह किया । ना जाने उसने अपने कितने सपनों को त्याग किया परंतु वह मेरे सपनों को हमेशा साकार किया।

मेरी जीत के लिए कई बार मां को हारते देखा है । उस छोटी सी आमदनी में भी मां को कई बार गुल्लक में पैसे डालते देखा है ।

शायद वह हमेशा यही सोचती होगी इस छोटी सी बचत से ही मेरे राजा बेटे की बड़ी जरूरत भी पूरा हो जायेगा ।
जब माँ शाम को रोटिया कमाकर लाती थी तो हमने यह कभी पूछने की हिम्मत ना कि कि मां दोपहर का खाना खाई भी थी या नहीं । परंतु मां हमेशा पुछ ही लिया करती थी, “बेटा , तुमने खाना खाया है ? ”

मां की इतनी हैसियत ना थी कि वह एक मंहगी स्कूल में पढ़ाए मुझे । लेकिन माँ ने यथासंभव अच्छा स्कूल में सिर्फ पढ़ाया ही नहीं बल्कि अच्छा संस्कार भी दी ।

जब बचपन में कभी परेशान होता , तो मां की आंचल में सो जाता था। मां के आंचल में सोने से सारी परेशानियां छूमंतर हो जाती थी । मेरी सफलता के लिए माँ ने ना जाने कितने पत्थर को भी ईश्वर मान कर माथे टेके है । पढ़ने के लिए दोस्तों की संगत से कान पकड़ कर लाना भी एक तरह से मां का प्यार ही दर्शाता था ।

बचपन में मेरे सुलाने के चक्कर में ना जाने कितने रातों मां ने जागकर विताई होगी । जब मेरी पहली पोस्टिंग दिल्ली में हुआ था तो मेरी खुशी से कहीं ज्यादा खुशी मां को हुआ था क्योंकि उन्हें लगने लगा मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं ।

मैं भी बहुत खुश था । सोचा परेशानियों के कारण मां जीवन में जो चीजें ना कर सकी थी। उसे मां के लिए अब पूरा करूंगा ।

मां के लिए अच्छी-अच्छी साड़ियां लाऊंगा क्योंकि बचपन में मैंने मां को एक ही साड़ी को कई बार शीलता देखा था ।

अब मैं दिल्ली आ चुका था लेकिन यहां मां की यादे बहुत आती थी । मां से प्रतिदिन फोन पर बातें होती थी , मां हमेशा की तरह फोन पर ही खाने-पीने की बात कर लेती थी ।

एक दिन माँ ने फोन पर ही बताई, “बेटा तुम्हारे लिए एक बहुत ही अच्छा घर से रिश्ता आया है , लड़की के परिवार वाले और लड़की भी अच्छी है । तुम बोलो तो मैं रिश्ता पक्का कर दूँ ।”

मैंने भी सोचा घर पर माँ अकेली रहती है अगर शादी हो जाएगी तो कम से कम मां की सेवा तो करेगी ।
मैंने शरमाते हुए कहा, “मां… अगर तुम्हे पसंद है तो मैं क्या कहूं। ”

मां ने रिश्ता तय कर दी , मैं दिल्ली पोस्टिंग के बाद से पहली बार दशहरा में घर गया, मां के लिए कई रंग- बिरंगी साड़ियां, मिठाईयां एवं अन्य जरूरत की चीजें लेकर गया ।

यह सब देख कर मां ने कहा, “बेटे यदि इतने खर्च करोगे तो बहू के लिए क्या बचाओगे ! ”

मैं खुश था क्योंकि मां को पहली बार आज इतनी खुशी के साथ कुछ कहता हुआ सुना था ।

कुछ ही दिनों बाद मेरी शादी हो गई । शादी के बाद सब चीजें सही चल रही थी लेकिन कुछ ही दिनों बाद अचानक मेरी पत्नी और मां के बीच मनमुटाव रहने लगा । मेरी पत्नी मेरे साथ दिल्ली में हीं रहने की जिद करने लगी फिर एक दिन हम दोनों दिल्ली चले आए । अब माँ घर में अकेली रहने लगी ।

मुझे पता था इस झगड़े में मेरी पत्नी की ही गलती रहती होगी । लेकिन मैं फिर भी चुप रहा क्योंकि मैं नहीं चाहता था की झगड़ा और बढ़ जाए ।
धीरे – धीरे मां से फोन पर भी बातचीत कम होने लगी क्योंकि मेरी पत्नी नहीं चाहती थी कि मैं अपनी मां से बात करूँ ।

अब कई महीनों बाद भी घर जाता तो मां की होठों पर वह मुस्कान फिर से कभी नहीं देख पाया । समय बदलता गया और समय के साथ हम कब बदल गए कुछ पता ही नहीं चला ।

अब तो कई महीनों तक मां से बात नहीं होती थी और नहीं मां का फोन ही आता था। अब मेरे भी दो बच्चे हो गए जिसके कारण मैं अपने परिवार में व्यस्त हो गया ।

कुछ साल बाद मां की याद आई और मैंने मां के नंबर पर फोन किया लेकिन नंबर स्विच ऑफ बता रही थी। मुझे कुछ घबराहट हुई और उस रात मुझे नींद भी नहीं आ पाई । मैं सुबह ही बिना किसी को बताए गांव चला गया , गांव के सभी लोग मुझे एक टक से देख रहे थें। शायद मैं कई वर्षों बाद घर गया था ।

जब मैं घर के अंदर गया तो बचपन की सभी यादें ताजी हो गई लेकिन घर में पहले जैसा रौनक नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे घर का कोना -कोना मुझसे नाराज हो और हमें धिक्कार रहा हो ।

मेरी नजर आंगन में लगी टूटी चारपाई पर गई जिस पर कोई बुड्ढी औरत सो रही थी । बाल बिखरी, आंखें धसा और गाल पिचका हुआ था । धूल से माथे एवं शरीर गंदे हो चुके थे । पहनी हुई साड़ी भी जगह-जगह से फटा हुआ था । शायद आंखों की रोशनी के कमी के कारण फटे हुए साड़ी भी सील नहीं पाई होगी ।

जब मैं धीरे -धीरे पास पहुंचा तो वह अचानक बोली, “बेटे तुम आ गए ? ”

मुझे आश्चर्य हुआ वह मात्र मेरी आहट से ही पहचान गई थी । वह बुड्ढी औरत कोई और नहीं बल्कि मेरी मां थी ।

मां ने कहा, “कैसे हो बेटे ? बहू और बच्चे कैसे हैं ? ”

मेरा जुबान लड़खड़ा रहा था । मैं मां के पैरों पर अपना सर पटक दिया । मुझे कुछ समझ नहीं आ रही थी,मैं क्या बोलूं ?

मां की शरीर में इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वह बैठ कर बात कर सके । फिर भी मां किसी तरह उठी और बैठी ।
उन्होंने कहा, “बेटा! क्या बात है ? परेशान क्यों है ? सब कुछ सही तो है ना ! ”

इसके बाद मां ने धीरे- धीरे चल कर एक थाली में दो सूखी रोटियां ला कर दी ।

“लो बेटे खाना खा लो , तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा । ”

मैंने रोटी के कुछ टुकड़े मुंह में डाला । परंतु मुझे अपने आप पर घृणा आ रही थी । आंगन की तुलसी के पौधे को देखा । ना जाने उस जगह बचपन से आज तक कितने तुलसी के पौधे बदली गई होगी परंतु मां का प्यार आज तक नहीं बदला , बिल्कुल आज भी वहीं प्यार था ।

मां ने कही, “बेटे बता कर आता तो तेरे लिए कुछ अच्छा खाना कहीं से ले आता। ”

मां की यह शब्द मुझे और भी निचोड़ दीया । मैं फफक कर रो पड़ा और मां से लिपट गया ।

मैंने अब मां के साथ ही रहने का फैसला कर लिया लेकिन भगवान ने मुझे दोबारा यह मौका नहीं दिया और कुछ दिन बाद ही मां की मृत्यु हो गई और वह हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चली गई ।

मेरे दिल में एक टीस हमेशा बना रहता है । मुझ जैसा पापी कौन होगा ? मां ने मेरे लिए हर सपनों को त्याग किया और मैंने माँ को ही त्याग कर दिया ।

मां खुद भुखी रहकर मुझे खाना खिलाया परंतु बदले में मैंने उसे भूखा मरने को छोड़ दिया । उसने खुद फटी पुरानी कपड़ा पहनी मगर मुझे हमेशा अच्छे कपड़ा पहनाया और मैंने उसे अंतिम समय तक अच्छे कपड़े ना दे सका । काश मैं मां की सेवा कर अपनी गलतियों का पश्चाताप कर पाता ।

©अविनाश अकेला
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