Beintehaa Ishq बेइंतहा इश्क़

Beintehaa Ishq। बेइंतहा इश्क़। स्कूल लव स्टोरी हिंदी में

कहानी अपने मित्रों को शेयर कीजिये

Beintehaa Ishq बेइंतहा इश्क़

Author – अविनाश अकेला

जब आप अपने घर छोड़कर पहली बार कहीं किसी अनजान शहर में शिफ्ट होते हैं ना ! , तो पहले के कुछ दिनों तक तो आपको सही से नींद तक नहीं आएगी। लेकिन कुछ दिनों बाद आपको इतनी नींद आएगी कि आप यह भूल जाएंगे आखिर आप इस अनजान शहर में आए थे क्यों?

मैं भी दसवीं के बाद पढ़ाई के लिए अपने छोटे से कस्बे  दनियावां  से निकलकर पटना कंकड़बाग में शिफ्ट हो गया था। मेरे लिए यह जगह बिल्कुल नई थी और इन नई जगहों पर नए लोग।

 इन नये लोगों के बीच मैं खुद को काफ़ी असहाय महसूस करता था। पहले के कुछ दिनों तक तो अपने घर वालों से दूर होने के गम ने सही से सोने नहीं दिया तो कुछ दिनों तक अपने कमीने दोस्तों से जुदा होने के गम ने।

फैमिली और दोस्तों के यादों के अलावा अपने  शहर से कुछ ऐसी खट्टी-मीठी यादें जुड़ी थी जो बार-बार अपने वही पुराने कस्वे मुझे अपनी ओर एक अदृश्य डोर से खींच रहा था।

जिसके कारण मेरे मन में यह ख्याल भी आने लगा था कि पटना छोड़ कर फिर से अपने शहर दनियावां चला जाऊं और वहां जाकर उन्हीं कोचिंग क्लास को ज्वाइन कर लूँ। जिससे मैंने दसवीं पास किया था।

मग़र इतने बड़े शहर के प्रतिष्ठित क्लास को छोड़कर वापस जाना किसी युद्ध से पीठ दिखा कर भागने से कम नहीं महसूस होता और दोस्तों के बीच बेज्जती अलग से होती। यह सोचकर मैं किसी तरह खुद को इस शहर में अडजस्ट करने की कोशिश करने लगा।

      एक दिन मैंने फाइनली अपने इन यादों को IITian बनने की ख्वाब से मार दिया, उसके बाद से सभी कुछ पीछे छोड़ कर, मैं अकेला! हां ,सिर्फ अकेला आगे बढ़ने को ठान कर पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने लगा।

 कोचिंग की नयी बैग, नई दोस्ती और  इन सबों के बीच एक नए सपना; सब पुराने चीजों को पीछे छोड़ने में काफी हिम्मत दी।

मुझे पटना आया लगभग 2 महीने हो चुके थे  जैसे-जैसे समय निकल रही थी वैसे-वैसे जिम्मेदारियां बढ़ रही थी। 5 घंटे की क्लास और उसके होमवर्क मुझे इतना थका देती थी कि शाम को सोते वक्त मुझे नींद बुलाने की जरूरत  नहीं पड़ती था।

नींद से आंखें जब भी खुलती थी, अपने सर के नीचे कोचिंग का असाइनमेंट बुक जरूर पाता था।

 मैं अक्सर पढ़ते-पढ़ते उन्हीं असाइनमेंट बुक पर सर रखकर सो जाता था। वैसे मैं जानबूझकर ऐसा नही करता था बल्कि पढ़ते-पढ़ते कब मेरी आँखे लग जाती थी कुछ पता ही नहीं चलता था।

एक सुबह मैं इन्हीं असाइनमेंट बुक पर सर रखकर सो रहा था उसी बीच मेरे रूम पार्टनर के मोबाइल के रिंग बजी।

 मेरे रूम पार्टनर के मोबाइल पर मेरे घर से कॉल आई थी। एक्चुअली, जब मैं पटना आया था। उसके कुछ दिन बाद ही मेरा मोबाइल फ़ोन खो गया था। खो क्या गया था! जब मैं रात 9:00 बजे अपने कोचिंग से लौट आ रहा था। उस वक्त मैं फोन पर एक दोस्त से बात करता हुआ आ रहा था। उसी बीच कुछ बाइक सवार उचक्के ने मोबाइल फोन छीन कर भाग गया था । और अब तक मैं कोई नया मोबाइल नहीं खरीदा पाया था।

” अमन , आज तुम्हें प्रतिभा सम्मान समारोह में बिहार शरीफ जाना होगा और वहां तुम्हें सुबह के 9:00 बजे तक पहुंच जानी है,, मेरे रूम पार्टनर ने कॉल डिस्कनेक्ट करने के बाद मुझे बताया।

प्रतिभा सम्मान समारोह “हिंदुस्तान दैनिक अखबार,, द्वारा प्रत्येक वर्ष बिहार के उन सभी विद्यार्थियों के लिए आयोजित करती है जो अपने विद्यालय में टॉप करते हैं।

इस टॉपर पर वाली लिस्ट में मैं भी शामिल था। मैंने दसवीं बोर्ड में 500 अंक में से 416 अंक प्राप्त कर इस लिस्ट में अपनी जगह बनाई थी।

मैंने अपने रूम पार्टनर का बात सुनने के बाद अपना ध्यान  घड़ी पर टीकाया। सुबह के 7:30 बज चुके थे।

 पटना से बिहार शरीफ जाने में कम से कम मुझे 1 घंटे समय लगेंगे वह भी बस मिलने के बाद। और भला मैं सुबह के 7:30 बजे तक अपने बिस्तर पर ही लेटा हुआ था। मैं फटाफट फ्रेश हुआ औऱ चेहरे पर पानी डाल कर कोलगेट से ब्रश किया ।

मैं क्लोजअप (Close-up) टूथपेस्ट इस लिए यूज नहीं करता हूं क्योंकि मुझे अपने बदकिस्मती पर पूरा भरोसा है कि मुझे कभी किसी के नजदीक आने के मौका ही नहीं देगी तो फिर क्लोज़अप से ब्रश करने का क्या फायदा ?

 ब्रश करने के बाद पेयर्स साबुन से अपने चेहरे को थोड़ा घिसा फिर पानी से धोकर सीधा बस स्टैंड के लिए निकल पड़ा क्योंकि तब तक इतना समय हो चुका था कि मैंने स्नान करना उचित नहीं समझा।

 8:15AM  तक मैं मीठापुर बस स्टैंड पहुंचकर; पटना से बिहार शरीफ़  जाने वाली गाड़ी पर बैठ चुका था।

भैया, यह बिहार है। यहाँ बस खुलने का समय तब तक नहीं होता है जब तक की उसमें यात्री को सीमेंट की बोरी जैसा आगे-पीछे कर पूरी तरह से ठूंस नहीं दिया जाता!

             आधे घंटे बाद बस पूरी तरह से भर चुका था। यात्री सीट के अलावे पूरी बस में खड़ी थी जिनके कारण बस के अंदर का तापमान बाहर के तापमान से काफी अधिक महसूस हो रहा था और मैं तो वैसे भी रूम से नहाकर नहीं निकला था जिसके कारण शरीर और चेहरे से पसीने की धार ट[पकर रूपा फ्रंटलाइन की बनियान को पूरी तरह से भींगा रहा था।

 खैर! किसी तरह मैं सुबह के 9:30 बजे तक बिहार शरीफ पहुंचा। मैं वहां पहुंचते-पहुंचते आधा घंटा लेट हो चुका था।

  मैंने बस स्टैंड से ऑटो पकड़ जैसे-तैसे किसी तरह सिटी हॉल पहुंचा, जहां हिंदुस्तान दैनिक अखबार द्वारा प्रतिभा सम्मान समारोह किया जा रहा था। धूप और गर्मी के कारण चेहरे से पेयर्स साबुन की खुशबू कब का ही उड़ गया था और अपने हाथों से चेहरे के पसीने पोछने के कारण चेहरे गंदे-भदे दिखने लगा था। और मैं उसी हालात में  हॉल के अंदर  चला गया।

वहां काफी लोग बैठे थे। मैं किसी तरह कर के स्टेज के पास पहुंचा। आगे की  खाली कुर्सी देख कर बैठ गया।

 वहां बैठने के कुछ समय बाद मुझे महसूस हुआ मेरी धड़कनें बढ़ रही है, सांसे तेजी हो रही है  और अजीब -सा बेचैनी हो रहा है ।  ऐसा मुझे हमेशा दसवीं की कोचिंग में मेरी क्रश (Crush ) को देखकर होता था।

मैं इधर-उधर हॉल में देखा। उसके बाद मैं अपने दाएं ओर देखा;मेरी कुर्सी से चौथे कुर्सी पर मेरी नजरे टिका,  हाफ स्लीव्स वाली नीली टॉप और बाएं हाथ में ब्लैक फीते वाली anlong घड़ी पहनी कोई लड़की दिखी। उसकी शरीर के बनावट बिलकुल आदिती जैसी लग रही थी।

“अरे ! यह तो आदिती ही हैं।” मेरे  मुंह से यह शब्द अचानक निकल पड़ा .

आदिती के खुले बाल हॉल में लगी पंखे से मध्यम- मध्यम झूम रहा था। कुछ बाल उसके चिकने-गोरे गाल पर पड़ रहे थे। उसने अपने हाथों से उन बालों को हटाते हुए बाएं तरफ मुड़ी। अचानक से उसकी आंखें मेरी आंखों से मिली।

 उसकी आंखें मेरी आंखों से मिली या यह सिर्फ मेरा भ्रम था। पता नहीं! मगर कुछ पल के लिए सारी दुनिया थम सी गई, मेरी सांसे रुक गई। और ऐसा महसूस हुआ जैसे इस पूरी हॉल में  सिर्फ मैं और वो है। और वो मेरे लिए ही यहाँ आयी है. परंतु कुछ सेकंड बाद  उसने अपनी नजर स्टेज की तरफ फेर ली थी।

आदिती ! आदिती जैन  मेरी 10th की क्रश थी। उसे यहां पाकर मेरी सारी नए सिद्धांत धरी की धरी रह गई। जैसे वहां मेरा खुद पर कोई काबू ना थी ।

 दिल के लाइब्रेरी से उसकी यादों की कहानियां, उसे चाहने की कहानियां, उसे देखने की तमाम ख्वाशे की पन्ने एक-एक कर मेरी आंखों के सामने फड़फड़ाने लगे।

मैंने उसे पहली दफा आचार्य कोचिंग सेंटर दनियावां में देखा था। आचार्य कोचिंग सेंटर ज्वाइन करने से पहले मैं एक ऐसे स्कूल में पढ़ता था जहां लड़कियों को सपने में भी देखने की इजाजत नहीं थी।

 उस स्कूल के प्रिंसपल कपिलदेव सर …, उन्हें प्रिंसपल कहूँ या शिक्षक समझ नही आ रही है। वैसे सिंपल शब्दों में कहूँ तो स्कुल के  सभी पद पर खुद ही विराजमान थे। यहाँ तक उनके अलावे स्कुल में कोई और शिक्षक थे ही नही .खैर ! इन बात को यही छोड़ देते हैं।

  कपिलदेव  सर  का मानना था कि दुनिया के हर विद्यार्थी को एक इंजीनियर ही बनना चाहिए ।  वो खुद आईआईटी निकालने में असफल रहे थे मगर वह अपने बच्चों को आईआईटियन (IITian) बनने की ट्रेनिंग क्लास पांचवी से ही शुरु कर देते थे।

 उनके सामने सिर्फ इंजीनियर की ही इज्जत थी वरना….।  और आशिक को तो वह किसी आतंकवादी से कम नहीं मानते थे।  मैं भी उनके इस इंजीनियरिंग ट्रेनिंग के सदस्य था और उस ट्रेनिंग के कारण मैं सब कुछ भूल चुका था। उस वक्त लगने लगा था दुनियां लोग सिर्फ पढने के लिए ही आते हैं।

 उनकी सुबह पांच से सात ट्यूशन होती थी।  उसके बाद सुबह 9:00 से शाम 4:00 बजे  तक स्कूल और फिर शाम को 5:00 से 7:00 ट्यूशन।

मैं यह सभी क्लास अपने घर से जाता था जिसके कारण हमारी हेल्थ का मां-बहन एक हो गया था।  मैं तो भूल गया था कि दुनिया में पढ़ाई के अलावा भी कुछ और होती होगी ।

 एक दिन मेरे पापा ने मेरे ऊपर तरस खाकर उस विद्यालय से नाम हटवा कर एक गवर्मेंट स्कुल में नामांकन करवा दिए और आचार्य कोचिंग सेंटर में ज्वाइन करवा दिया।

वह मेरा पहला दिन था। मैं अपनी गैंग कंपनी की रेंजर साइकिल पर बैठकर कोचिंग गया था। क्लास के अंदर पहुंचते ही मेरी नजर आदिती की  चेहरे पर गई। छोटी सी आंखें, गुलाबी होंठ और तीखी नाक बिल्कुल डॉल जैसी पतली। अपने गुलाबी लिप्स से लिंक ग्लेशियर कलम को दबाकर किसी प्रश्न की हल करने  में गुम थी।

 उसे देख कर पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्राकृति किसी को  इतना सुंदर भी बनाई है वरना पहले तो मुझे लगता था प्राकृति सिर्फ कपिलदेव सर जैसे खडूस लोग ही बनाता है।

उस दिन उसे देखने के बाद उसे देखना मेरी लत -सी बन गई थी।  जब तक उसे  एक-दो बार सही से निहार नहीं लेता था तब तक मेरी आंखें से किताब पढ़ी ही नही जाती थी।

 उसका मुस्कुराना,अपने दोस्तों से बैठकर बातें करना और बीच-बीच में तिरछी नजर से मुझे देखना और देख कर फिर से अचानक रुक जाना और  फिर किताबे खोलकर पढ़ने लगना। उसकी ये सभी हरकते अच्छा लगता था।

मैं उसके चेहरे की तस्वीर खींचकर अपनी अनलिमिटेड हार्ड डिक्स वाली यादों की मेमोरी में हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहता था। उसकी प्यारी आवाजों को रिकॉर्ड कर किसी एकांत जगह में बैठकर सुनना चाहता था।

             शुरू में यह सब मुझे नॉर्मल सा लगता था लेकिन कुछ दिनों बाद मुझे महसूस हुआ यह सब नॉर्मल नहीं है। यह सब साधारण नहीं है।  बल्कि मुझे उससे प्यार हो गया है क्योंकि उसके क्लास ना आने पर मेरा दिल बिलकुल नहीं लगता था , उसके बिना पूरी क्लास  सूना-सुना सा लगता था।

क्लास से छुट्टी मिलने के बाद उसके पीछे-पीछे एक पल  मुड़कर देखने के लिए पूरी रास्ते जाया करता था।

“आखिर क्यों? मैं तो किसी और के लिए ऐसा नहीं करता  हूँ “। मैं यह बाते खुद से करने लगा

 अब तो क्लास में छुट्टी के बाद अपने बेस्ट फ्रेंड राजीव  के साथ उसके घर के तरफ भी जाने लगा था। जब भी मैं उसके घर की तरफ जाता मुझे निराशा ही हाथ लगती थी। वह कभी भी अपने घर के बाहर नहीं दिखती थी । हां, मगर एक-दो हादसे ऐसे भी  हुए हैं जब हम उसके घर की तरफ जा रहे थे तो वह रास्ते में ही मिल गई हो।

  जब वह रास्ते में मिलती थी तो फिर वही तिरछी नजर वाली अंदाज से थोड़ी बहुत देखती थी और फिर आगे निकल जाती थी । मैं उसकी तरफ चेहरे कर उसे पीछे मुड़ जाने की उम्मीद से देखता था मगर वह मेरी तरफ बिना देखे ही अपने घर के अंदर चली जाती थी।

 इसी तरह कई महीने गुजर गया मगर उससे कभी बात नहीं कर पाया था।  फिर कुछ दिनों बाद उसे एहसास होने लगा कि मैं उसे घूरते रहता हूं। कुछ दिनों तक कुछ अलग  या गुस्से  जैसा  रिएक्ट किया। मगर फिर नॉर्मल हो गयी।

 अब बीच-बीच में कभी-कभी वह भी मेरी तरफ प्यार वाली नजरों से देख लिया करती थी। आदिती को मेरी तरफ देखना, मेरी एक तरफा प्यार को और मजबूत कर देती थी अब मेरे दिल को कुछ ऐसे सिग्नल आने लगे थे जो यह बता रही थी कि आदिती भी मुझसे प्यार करने लगी है।

हर लड़कियों में एक बुरी बात यह जरूर होती है कि वह किसी से प्यार करें या ना करें मगर वह आपको ऐसा दिखाती है जैसे वह भी तुम्हें पसंद करने लगे हो ।

आदिती भी मेरी हर बातों पर कुछ इसी तरह रिएक्ट करने  लगी थी।

अब मैं उसे सड़कों पर मिलता था तो वह मुझे दूर दूर तक देखती रहती थी। जब तक की मैं उसके आंखों से ओझल ना हो जाऊं। अब तक उसे यह मालूम हो चुकी थी कि मैं उससे प्यार करने लगा हूं।

  कुछ दिन बाद मेरा बेस्ट फ्रेंड राजीव आदिती की फ्रेंड पूजा को प्रपोज कर दिया उस दिन पूजा और आदिती एक साथ ही थे। इधर मैं और राजीव साथ में थे।

उस दिन पूजा आदिती के सामने राजीव का प्रपोजल रिजेक्ट कर दी और राजीव को काफी इंसल्ट कर दिया जिससे मुझे काफी दुख हुआ ।

राजीव मेरा बेस्ट बेस्ट फ्रेंड था।  हम दोनों अक्सर साथ में रहते थे इसलिए मैं उसकी फीलिंग को अच्छी तरह समझता था।  राजीव का  फीलिंग पूजा के लिए बिल्कुल सच्चा था । वह सच में उसे बहुत प्यार करता था।  हमेशा उसी के बारे में बातें करता रहता था। जब भी उसे पढ़ाई से छुट्टी मिलती थी। हम दोनों अपने घर से निकल कर बाबु उच्च विद्यालय के मैदान में बैठकर हमेशा उसी के बारे में चर्चा करते रहते थे।

 मैं भी यही चाहता था कि राजीव की फीलिंग को पूजा समझे और इसे प्यार करें लेकिन उस दिन पूजा द्वारा राजीव को इतना इंसल्ट करना मुझे गवारा लगा।  मैं भी लड़कियों से चिढ़ गया था। मगर आदिती  के लिए फीलिंग कम नहीं हुआ  था।

कुछ दिन बाद मैं भी एक अच्छ मौका देखकर आदिती को प्रपोज कर देना चाहता था।  मगर पूजा और राजीव के घटनाक्रम को देखकर मुझे फिलहाल इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी।  फिर भी मैंने आदिती की  फ्रेंड दीपिका से अपने हाल-ए-दिल बयां कर दिया और बोला यह बातें तुम आदिती को बता देना।

मगर पता नहीं दीपिका ने मेरी बात आदिती को बतायी या नही। मगर उसने जबाब के बदले में कुछ नही बतायी । उस दिन के  बाद दीपिका मुझसे ज्यादा बातें करने लगी।

 लड़कियों में यही होता है। यार! आप  जिस से बात करना चाहोगे वह तो आप से बात करेगी नहीं मगर  जिसे आप बात करना नहीं चाहोगे वह आपके पीछे पड़े रहेगी। 

अब दीपिका द्वारा मुझसे ज्यादा बात करना परेशानी बनने लगी ।  वह  जहां भी मिलती मुझसे बातें कर लेती अब मेरे बारे में लोग के मन में  गलत विचार आने लगा ।

 आदिती भी उसके कारण से मुझसे चिढने लगी और नाराज -नाराज सी रहने लगी अब उसने मेरे तरफ देखना कम कर दी थी । मैं अब परेशान हो गया था । 

मैंने सोचा था दीपिका मुझे आदिती से मिलाने में हेल्प करेगी और वह खुद ही मेरे पीछे पड़ कर परेशान कर दी यहाँ तक मुझे उससे  भी अलगाव पैदा कर दी । मुझे समझ में नही आ रहा था कि आखिर मैं करूं तो क्या करूं ?

फाइनली एक दिन मैंने निर्णय किया कि आज खुद से ही उसे अपनी दिल की बाता  बता दूंगा। मगर उस दिन भी  समय ने साथ नहीं दिया। किसी कारणवस उसे प्रोपोज नही कर पाया। फिर अच्छे मौके का इंतजार करते -करते  समय बीतता गया और एक दिन ऐसा भी आया कि हमारी कोचिंग क्लासेज बंद होने वाले थे।

हमारी बोर्ड की एग्जाम अगले सप्ताह थी।  जिसके कारण सभी स्टूडेंट व्यस्त-व्यस्त दिख रहे थे और इस व्यस्तता में आदिती को प्रपोज करना उचित नहीं समझा। फिर मैंने दिल को यह कह कर मना लिया कि चलो परीक्षा के बाद उसे आराम से प्रपोज कर दूंगा।

 फिर मैंने उससे कुछ दिनों के लिए दूरी बना लिया लेकिन मुझे उस वक्त यह आभास नहीं था कि कुछ दिनों की दूरी हमेशा-हमेशा के लिए दूरी बन जाएगी।

 हमारी परीक्षा खत्म हो चुकी थी और क्लासेज तो कब के ही बंद हो चुके थे। और आदिती से मिला लगभग हफ्तो बीत चुका था। मैं बाजारों में इधर-उधर उसे ढूंढता रहा उसके घर की तरफ गया मगर वह कहीं नहीं दिखी।

उससे मिलने सुबह निकलता तो शाम तक मायूस होकर बिना मिले ही वापस अपने घर को लौट आता ।

 जिस कस्बे में मैं रहता था जहां कभी हरपल दिल लगता था। आज उसी जगह तन्हाई काट रहे थे।

अब कुछ सुना-सुना सा लगने लगा था ,किसी चीज में भी दिल नही लग रहा था । एग्जाम के बाद कुछ दोस्त कोटा चले गए तो कुछ दोस्त जमशेदपुर और कुछ बचे-खुचे दोस्त अपने-अपने गांव । मैं ही रह गया था अपने उस छोटे से कस्बे में।

मैं अपनी उदासी को कितना भी छुपाता था मगर वह चेहरे से साफ दिख ही जाती थी। काश !मेरे पास टाइम मशीन होती तो इस वक्त को फिर से पीछे कर फिर वही आचार्य कोचिंग सेंटर जॉइन करता और फिर से उससे मिलकर अपनी हाल-ए-दिल बता देता। भले ही वह इंकार करती, गुस्सा करती या मुझसे नफरत करने लगती मगर उसे प्रपोज ना करने की मलाल दिल में तो नहीं रहता।

 आज उसे प्रपोज ना करने की मलाल दिल में एक असहनीय दर्द बनकर छुपाए रहता हूं। एक दिन मैं शाम को अपने दोस्त राजीव के साथ एक कोचिंग के  गलियों से गुजर रहा था । वहां अचानक एक बिल्डिंग की सीढियों पर से ऊपर जाती हुई आदिती दिखी।

 वह अपने हाथ में क्लासमेट की मोटी नोटबुक और मोडर्न  फिजिक्स के किताबें लिए जा रही थी। उसने अचानक से मुझे देखी और सीढ़ियों पर उसके पैर रुक गए कुछ सेकंड तक वह अपनी आंखें मलते हुए एक-दो बार मुझे देखी फिर अपनी क्लास रूम की तरफ आगे बढ गयी ।

उसके बाद वह अपने क्लास रूम के अंदर चली गई।  मैं उसे इतने दिनों बाद देखकर होश खो बैठा था ऐसा लग रहा था; मैं दौड़कर उसके पास चला जाऊं, उससे पूछूं  तुम अब तक कहां थे ? मैं तुझे कितना ढूंढा, देख क्या हाल हो गया है मेरा ? पागल सा हो गया हूं। क्या तुझे मेरा इतना भी ख्याल नहीं या फिर तुझे इतना भी पता नहीं कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं ?

 मगर कहते हैं ना सपने सिर्फ सपने ही  रहता हैं ।  इन ख्वाब से बाहर निकला तो देखा सीढियाँ से आदिती कब के जा चुकी हैं ।  मेरे दोस्त ने मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया । मैं जैसे ही आगे बढ़ा फिर वह क्लास रूम से बाहर निकल कर फिर उसी सीढियों पर आकर सड़क पर अपने नजरे से मुझे ढूंढ रही थी लेकिन मैं जिस जगह पर खड़ा था वहां से हटकर आगे बढ़ चुका था।

 शायद वह मुझे दोबारा नहीं देखी लेकिन मैंने उसके आंखों में अपने लिए प्यार देखा था , उस वक्त मेरे दिल में भी उसके लिए बेइंतेहा प्यार उमड़ रहा था । जब मैं उसे नही दिखा तो  वह  वापस अपने क्लास रूम के अंदर चली गई।

*

 ” आदिती जैन, बाबू उच्च विद्यालय दनियावां ” एंकर की आवाज मेरे कानों में पड़े।

 एंकर की यह आवाज मेरे सीने में एक खंजर सा प्रहार करता हुआ ; यादों की दुनिया से  बाहर निकाल मुझे हिंदुस्तान प्रतिभा सम्मान समारोह में मौजूद होने का एहसास दिलाया।

मैंने सामने देखा स्टेज की तरफ मुस्कुराती हुई धीरे- धीरे कदमों से आदिती जा रही थी। उसने स्टेज पर जाकर मेडल लिया और वहां मौजूद सभी अधिकारीयों को प्रणाम कर सामने बैठे दर्शकों से मुखातिब हुई। उसे मेडल लेते ही सभी दर्शक तालियों से उनका स्वागत किया।  मैं भी उसके इस सफलता के लिए तालियों से बधाई दिया, वो भी मेरी तरह अपने स्कूल टॉपर थी।

वह मेडल लेने के बाद स्टेज से उतर कर मेरी तरफ से ही अपनी कुर्सी पर वापस बैठने जा रही थी । मगर उसने मेरी तरफ एक पल के लिए भी नहीं देखी जबकि मेरी आंखें उसकी चेहरे से एक पल के लिए भी झपक नहीं मारी ।

अब तब तक काफी समय बीत चुके थे। दोपहर के लगभग 3:00 बज गये ।  कुछ समय बाद आदिती  वहां से अपने घर के लिए निकल गयी। मगर मैं वहीं पर अपनी बारी  आने  का इंतजार करता रहा। 

कुछ मेहमानों के स्पीच के बाद एंकर ने -“अमन सिंह ,उच्च विद्यालय भोभी ” 

नाम का जिक्र किया।  मैं अपनी सीट से खड़ा होकर स्टेज पर चला गया और पुरस्कार प्राप्त कर वहां से सीधा हॉल से  बाहर निकला ।

हॉल से बाहर आने के बाद कुछ देर तक बिहार शरीफ के सड़कों पर इधर-उधर आदिती को ढूंढने की कोशिश करने लगा । सोच शायद वह कहीं बाजार में कुछ खरीदने के लिए रुकी हो । और ईश्वर ने चाहा तो आज उससे  मिलने का मौका  भी मिल जायेगा और जो बातें मैं उससे आज तक नहीं बता पाया उसे आज बोलने में कामयाब हो जाऊं । 

मगर वह कहीं नहीं दिखी। उसे नही मिलने  कारण मुझे आज बहुत दुख हुआ।  मुझे यह पुरस्कार मिलने की जितनी खुशी हुई थी उससे कहीं ज्यादा दुख आदिती को ढूढने के बाद  ना मिलने से हो रहा था।

            वह आज भी पहले की तरह मुझसे दूर जा चुकी थी । आज मुझे पहली बार खुद के नासमझ पर बहुत गुस्सा आ रहा था।  मैं सोच रहा था ये प्यार-व्यार सिर्फ मेरी भ्रम हैं । 

मैं आदिती के बारे में सोचता हूं यह सिर्फ मेरा बेइंतहा इश्क है उसके दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है। अगर वह मुझसे प्यार करती या मेरे लिए थोड़ी-सी भी फीलिंग होती तो इतने दिनों के बाद मिलने पर  इस तरह बिना बात किए यहां से नहीं जाती।

आखिर मैं क्यों इतने दिनों से उसे प्यार कर रहा हूं? क्यों किसी अनजान के लिए इतना बेसब्र हो रहा हूँ ?  आखिर क्यों मैं इतने दिनों से उससे मिलने के लिए तड़प रहा हूं ? अगर उसके दिल में मुझसे मिलने के थोड़ी-सी भी  तड़प होती तो शायद वह आज इस तरह बिना कुछ बोले ,बताएं गुमसुम नहीं चली जाती। एक पल के लिए ही सही मगर वह मेरे लिए रुकती जरूर।

इधर एक मैं पागल हूं उसके लिए, जो  सड़कों पर उसे इधर-उधर पागलों जैसा ढूंढ रहा हूं। मैंने इस तरह से खुद को कोस-कोस कर उसकी यादों के पीछे छोड़ने के लिए खुद से लड़ा ताकि मैं उसे ना ढूंढ पाने की नाकामी अपने चेहरे पर ना आने दूँ ।

 मैं खुद से कितना भी झूठ बोल लूँ  मगर मेरा दिल नहीं मान रहा था।  वह अंदर से बोल रहा था।  यार तुम कुछ भी बोलो, तुम उससे  कितना भी गुस्सा कर लो मगर तुम उसे नही भूल पायोगे।

तुम आज भी उससे बेइंतहा इश्क करते हो।  तुम अभी भी उससे मिलने के लिए तड़प रहे हो।  मगर ना मिलने की गम  छुपाने के लिए ऐसा  बोल रहे हो।

          मैं भी अपने दिल की आवाज की बात  सुना और अपने दिल को मनाते हुए बोला, “ हां! यार तुम सही बोल रहे हो।  मैं उसे नहीं भूल पाता हूं । मैं उससे बेइंतहा मोहब्बत करता हूं। काश ! जिस तरह  मेरा दिल मेरी बात समझ जाती हैं  ये बात आदिती भी समझ पाती।

 इसी तरह मेरे और मेरे  दिल से बातचीत जारी रहा फिर कब रामचंद्रपुर बस स्टैंड पहुंच गया कुछ पता ही नही  चला।  वहां से पटना आने वाले बस पर चढ़कर फिर से एक बार अपनी दसवीं की यादों में खो गया।

                                             जैसे-जैसे मैं अपने शहर कस्बे दनियावां से आगे की तरफ बढ़ रहा था।  वहां की खुशबू वहां की यादें पीछे छुटता जा रहा था। और फिर से मैं अपने सपने और अपने सिद्धांतों के करीब आ रहा था।  मैं जैसे-जैसे पटना के नजदीक पहुँचने लगा मेरे कोचिंग की परेशानियां वहां के होमवर्क याद आने लगी और एक बार फिर से  फैमिली, दोस्त और मेरे प्यार आदिती सब पीछे छूट चुके थे।

 Warning :- यह कहानी एवं इसके सभी चरित्र  पुर्णतः काल्पनिक हैं। इस कहानी को  किसी जीवित-मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नही हैं . इस कहानी में use किये गये हिंदुस्तान अख़बार एवं जगह आदि का नाम केवल जुड़ाव महसूस करने के लिए इस्तेमाल किया गया हैं .निजी तौर पर इससे कोई लेना-देना नही हैं . मगर फिर भी यह कहानी किसी के जीवन से प्रभावित होती हैं तो उसे मात्र एक संयोग माना जाये .

 All rights reserved by Author


कहानी अपने मित्रों को शेयर कीजिये
Leave a Reply

Your email address will not be published.