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Teri-Meri Aashiqui। तेरी – मेरी आशिकी। Part – 04। हिंदी कहानी

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Author – अविनाश अकेला 

तेरी-मेरी आशिकी का Part- 03 पढने के लिए यहाँ क्लिक करें  

 

मैंने पलट कर देखा। वह अपने आंखों से इशारा कर  मुझे डांस टीम में जाने बोल रही थी। साथ ही वह अपने अंगूठे से लूजर (Looser) का इशारा भी कर रही थी।

इसके बाद मैंने कुछ सोचा नही सीधा डांस ग्रुप में चला गया। फिर जो डांस किया वह सबके होश उड़ा देने वाली डांस थी। लोग तो पहले से लड़कियो के डांस देख कर लड़कियों के डांस को ही  सबसे बेहतरीन डांस मान कर बैठे थे। लेकिन जब हम लड़कों ने डांस किया तो सब लड़कियों की डांस चीनी कम पानी हो गई थी। परफॉर्म खत्म होने के बाद मैंने  सभी लोगों को ध्यान से देखा, सारे लोग तालियां बजा रहे थे।

 

“भाई लड़कों में भी दम है। ” बैठे उन सभी मेहमानों में से किसी एक ने बोला। उनकी बात सुनकर मेहमानों की तालियां और तेजी से बजने लगे।

“क्यों दीपा डार्लिंग मेरा डांस कैसा लगा?”  मैंने दीपा के पास जाकर उसके कानों में बोला।

“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता हुआ?” दीपा आश्चर्य होकर बोल पड़ी।

“दीपा जी हम भी थोड़ा स्मार्ट है।” मैंने थोड़ा चीढ़ाने  वाली स्टाइल में बोला था।

पहले उसने अपनी आंखें चढ़ाली फिर कुछ पल बाद मुस्कुराकर अपने अंगूठे से लूजर (Looser) का इशारा कर वहां से भाग गयी।

 

वह जितनी बार मुझे अपने अंगूठे से लूजर बोलती थी उतनी ही बार उससे प्यार और अधिक बढ़ जाता था। क्योंकि उसी वक्त उसके चेहरे पर असली खुशी और क्यूटनेस दिखाई देती थी। मैं दीपा को वहां से जाते देख ही रहा था कि मेरी कानों में कुछ लोगों की आवाजें सुनाई पड़ी, मुड़कर दूसरी तरफ देखा तो कुछ लोग एक साथ  झुण्ड बना कर खड़े थें ।मैंने वहां जाकर देखो।

“अरे कैसे होटल में तुम लोग शादी कर रहे हो? यहां के वेटरों  को तो तमीज से बात करने भी नहीं आती है।” सुजाता मौसी गुस्से में बोल रही थी।

 

“क्या हुआ मौसी ?” मैं वहां पहुंचते ही बोला।

“जब मैंने इस बेटर से कॉफी मांगा तो इसने बोला अभी टाइम लग सकती है। और जब मैंने पूछा क्यों ? तो यह बदतमीजी करने लगा।” मौसी अपनी सफाई देती हुई बोली।

 

वेटर उसी जगह पर अपने गाल को दाहिने हाथ से पकड़कर खड़ा था। मौसी ने इस बेटर को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दी थी। कुछ देर बाद वहां उस होटल के मैनेजर भी आ चुका था और वह अपनी वेटर की ओर से माफी माँगा।

वैसे मैं जानता था। बेटर की गलती नहीं होगी बल्कि मौसी जानबूझकर ऐसा ड्रामा कर रही थी। मगर उस वक्त ये पता नहीं थी कि आखिर यह सब कर के मौसी क्या साबित करना चाह रही थी।

 

“मौसी ये लोग माफी मांग रहे हैं इन्हें माफ कर दो अगली बार से ऐसा नहीं होगा।” मैं मौसी को समझाते हुए बोला ।

 “क्या हुआ दीदी ? ” मेरी मां वहां पहुंचते ही सुजाता मौसी से बोली।

“अरे अब क्या पूछ रही हो! पहले पूछ ली होती तो इससे बढ़िया होटल और बहू तुम्हें बताती । मगर तुम लोग तुम लोग मुझसे कभी पूछते ही कहाँ हो ?” सुजाता मौसी यह बोलकर गुस्से से मुंह फुला कर वहां से चली गई ।

मौसी का यह ड्रामा देखकर वहां पर उपस्थित सभी रिश्तेदार आश्चर्य थे।

*

कुछ समय बाद मैं अपने दोस्तों के साथ जयमाला वाली स्टेज के पास बैठा था। तभी उसी वक्त वहां 10-12 वर्ष की लड़की मेरे पास दौड़ी आई।

 

 “इनमें से छोटे भैया कौन है ? ” आकर बोली ।

 

“मैं हूं।…क्या बात है ?… बोलो?” मैंने  जवाब दिया।

“यह लो आपके लिए दीपा दीदी ने भेजी है” उस बच्ची ने कागज का एक  छोटा-सा टुकड़ा देती हुई बोली।

मैंने कागज के उस छोटा-सा टुकड़ा को लेते समय इधर उधर देखा। वहां हम दोस्तों के अलावा कोई और नहीं था। मेरे सभी दोस्त उस छोटी सी बच्ची को ध्यान से देखे जा रहे थे आखिर ये लड़की हैं कौन ?

 “ये क्या है?” मैंने उस कागज के टुकड़े को लेते हुए उस से पहले पूछा।

“आप खुद ही खोल कर देख लो।” यह बोलकर लड़की वहां से चली गई।

 

मैं उस कागज के टुकड़े को खोल रहा था। मेरे सभी दोस्तों का ध्यान उसी कागज के टुकड़े पर ही टिकी थी। उस टुकड़े को खोलते समय मेरी  धड़कन जोरो से धक-धक कर रहा था। उस वक्त मुझे लग रहा था किसी लड़की ने मेरे लिए लव लेटर लिख कर भेजी है। मैं भगवान को याद कर उस कागज के टुकड़े को खोला।

 

“दम है तो दूल्हे का जूते बचा लेना वरना…..”  कागज की टुकड़े में लिखा यह पढ़ कर अपनी नजर आगे की ओर किया। कुछ दूर पर कुछ लड़कियों का झुंड हम लोगों को देखकर खिलखिला कर हंस रही थी। उन लड़कियों में एक दीपा भी थी।

शाम के 6:00 बजने वाले थे। दूल्हा-दुल्हन  मंडप में बैठ चुके थे। सभी मेहमान  कुर्सी पर  बैठे थे। पंडित मंत्रों का जाप  कर रहा था और मैं भैया के सीधे  थोड़ी दूरी पर बैठा था। जहां से दीपा अच्छी तरह से दिख रही थी। उस वक्त दीपा हरे रंग की लहंगा-चुन्नी पहन रखी थी। उस लहंगे –चुन्नी में उसकी सुंदरता उस वक्त पूरी तरह से निखार कर बाहर आई हुई थी।

उसकी हसीन चेहरा से अपनी आंखें को हटाने की जरा-सा भी दिल नहीं कर रही थी। मैं जब भी उसे देखकर मुस्कुराता था, बदले में वह भी कभी-कभार थोड़ा मुस्कुरा देती थी।

    जूता चुराने की धमकी मुझे अच्छी तरह से याद थी इसीलिए मैं जूता की देखभाल के लिए अपने दोस्त को जूते के पास ही बैठा रखा था और मैं इधर दीपा पर नजर रखा हुआ था।

 मैं जानता था अगर दीपा भैया के जूता छुपाने में कामयाब हो गई तो फिर हम लड़कों की बहुत बेइजती हो जाएगी । खाश कर दीपा तो लूजर (Looser) बोल-बोल कर प्राण ही ले लेगी ।

जब विवाह संपन्न हुआ तब सभी उपस्थित मेहमान-रिश्तेदार वर-वधू को चावल की अछत-फुल छींट कर उन्हें आशीर्वाद दिया। उसके बाद जब भैया मंडप से निकलकर अपने जूते पहने ने के लिए जूता ढूंढा तो जूता वहां पर नहीं थी। मैंने अपने दोस्तों की ओर देखकर पूछा,“ भाई जूता कहाँ है ? ” 

Continue ……

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This entry is part 04 of 21 in the series तेरी - मेरी आशिक़ी

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