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Teri-Meri Aashiqui। तेरी – मेरी आशिकी।Part – 19। हिंदी कहानी

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Author- अविनाश अकेला 

तेरी-मेरी आशिकी का Part- 18 पढने के लिए यहाँ क्लिक करे

 

दीपा की बात सुनकर मैं मुस्कुरा दिया।  और उसके नजदीक जाकर उसे अपने बाहों में ले लिया। मैने अपने दाहिने हाथ उसके कमर पर और बाएं हाथ उसके गर्दन के पास रख कर अपनी होठ को उसके होठों के पास ले गया।

 

“मेरे छोटे बाबू यह क्या कर रहे हो?” दीपा अपनी आंख को बंद करते हुए धीमी आवाज में बोली।

 

“यूं समझ लो अकेली अवला नारी पर अत्याचार” इसके बाद मैं अपनी  होंठ दीपा के होठों से चिपका दिया। वह बेचारी कुछ  कुछ बोलना भी चाह रही थी तो वह बोल नहीं पाई।

 

हम दोनों लगभग इसी तरह दो-तीन मिनट एक दूसरे में चिपके रहे।

 

“अब बस भी करो  छोटे”  दीपा मुझ से कुछ दूरी पर हटती हुई मुस्कुरा कर बोली।

उसके बाद में दीपा को बाय बोल कर सीधे अपने घर चला आया। घर आते-आते काफी शाम हो चुका था।

घर में देखा ऑफिस से भैया भी आ चुके थे। सुजाता मौसी और मेरी मम्मी कमरे में टीवी देख रही थी जबकि आदिती भाभी किचन में सभी के लिए खाने बनाने में लगी हुई थी।

“कॉलेज से इतनी लेट के आ रहे हो ? अब तक कहां थे?” भैया मुझे देखते हैं बोल पड़े।

“भैया आज छात्र संघ चुनाव का रिजल्ट आया है। और इस बार छात्रसंघ चुनाव मैं जीत गया हूं। जिसके खुशी में कॉलेज के कुछ फ्रेंड और छात्र संघ चुनाव के छात्र गण एक छोटी सी पार्टी रखे थे। जिसके कारण थोड़ी लेट हो गई और  साथ ही आज दीपा के भैया उसे कॉलेज से रिसीव करने नहीं आए थे जिसके कारण मुझे उसे भी कॉलेज से घर छोड़ने जाना पड़ा। तो ……”  मैंने कहा।

“ठीक है जाओ फ्रेश हो जाओ”

भैया के बात सुनकर मैं अपना बैग रख सीधे बाथरूम में चला गया और हाथ मुंह धो कर फ्रेश हुआ फिर अपने कमरे में चला गया।

आधे घंटे बाद खाने बन चुके थे। हम सभी डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठे थे अदिति भाभी खाने लाकर टेबल पर रख रहे थे।

“निशांत आज दोपहर में फ़ोन पर तुम कुछ बता रहे थे… वो कुछ छात्र संघ चुनाव के बारे में।” मां मुझसे बोली।

 

“जी माँ.. वो यह की  इस बार छात्र संघ चुनाव मैं जीत गया हूँ।” मैं थोड़ा सक-बकाते हुए बोला। क्योंकि मुझे पता है, यह सब चीजें मेरी मां को बिल्कुल भी पसंद नहीं है। मां नहीं चाहती है कि मैं इन सब चीजों में रहूं।

 

“बेटा कॉलेज जा कर पढ़ाई करने तक तो सही थी । अब ये चुनाव-उनाव , छात्रसंघ वगैरह में पड़ना कहां तक सही है। मुझे लगता है इन सब चीजों में पङकर तुम्हें अपना वक्त बर्बाद नहीं करनी चाहिए।”

 

“मां! मैं कोई नेता नहीं बन रहा हूं और नहीं मुझे इन सब चीजों में इंटरेस्ट है। बस कॉलेज में छोटे-मोटे प्रॉब्लम है उसे दूर कर  विद्यार्थियों के हित में कुछ काम करना चाहता हूं।”

 

“बहन निशांत सही कह रहा है। अरे जवानी है थोड़ा कॉलेज जाएगा, नेता बनेगा और लोगों के हित के लिए थोड़ा काम करेगा तब तो इसे भी दुनियादारी की समझ आएगी। अब बेचारे को नेतागिरी करने का शौक है तो फिर तुम बीच में क्यों आ रही हो !” सुजाता मौसी ताने मारने वाली स्वभाव एक बार फिर मुझ पर इस्तेमाल की।

 

सुजाता मौसी की बात सुनकर मेरा खून खौल उठा।

 

मैं सोचने लगा। क्या मैं सच में नेतागिरी करना चाहता हूं? क्या मैं सच में गलत कर रहा हूं? मुझे कॉलेज के बारे में नहीं सोचना चाहिए? मुझे छात्रसंघ चुनाव नहीं लड़ना चाहिए ?

 

“अरे मौसी आप लोग भी छोटी सी बात को तिल का तार बनाने में लगे हुए हैं। अरे कॉलेज में ये सब होता है। और इसमें गलत भी क्या कर रहा है। अपने कॉलेज में होने वाले परेशानियों से विद्यार्थियों को बचाना चाह रहा है। कॉलेज के लिए कुछ काम करना चाह रहा है तो इसमें क्या बुराई है।” भैया अपने मुंह में रोटी के एक टुकड़ा डालते हुए बोले।

 

“अर्जुन अब तुम इसके दफ़्तदारी मत करो। यह तुम्हारे छूट के वजह से ही मनमानी करता रहता है। देखो इसकी उम्र हो गई है कि ऑफिस जाकर तुम्हारा काम-धाम देखें मगर यह कॉलेज में नेतागिरी करने में लगा हुआ है।” मां बोली।

 

“मां अभी निशांत की पढ़ने की उम्र है आराम से पढ़ने दीजिए। अरे काम का क्या है!….कॉलेज खत्म करके काम तो करना ही है।” अर्जुन भैया ने कहा।

 

मैं भैया की यह बात समाप्त करते-करते मैं अपना खाना भी समाप्त कर चुका था। मैं जितना जल्दी हो सके वहां से उठ कर अपने कमरे में चला गया।

 

और बाकी लोग वहीं पर बैठकर मेरे नेतागिरी मुद्दे पर चर्चा करते रहे।

 

कमरे में जाकर बिस्तर पर रखें अपना फोन को उठा कर व्हाट्सएप के नोटिफिकेशन देखने लगा। बहुत सारे लोगों के कांग्रेचुलेशन की मैसेज थी और उनमें सब के बीच दीपा के भी कुछ मैसेज थे। सभी को रिप्लाई करते हुए। मुझे लगभग आधे घंटे बीत गये। उसके बाद मैं दीपा से थोड़ी देर बात किया और फिर सो गया।

 

अगले दिन ठीक 11:00 बजे कॉलेज के ऑफिस में प्रिंसिपल सर के सामने बैठा था। मेरे साथ दीपा और राहुल भैया के अलावे कुछ और विद्यार्थी थे। हम लोगों को प्रिंसिपल सर और कॉलेज के अन्य कर्मचारीगण शपथ समारोह के बारे मे जानकारी देने के लिए बुलाया था।

 

“कल दोपहर 2:00 बजे शपथ समारोह रखा गया है आप सब तय समय पर पहुँचेंगे।” प्रिंसिपल सर ने कहा।

 

“Ok सर”

 

ऑफिस से निकलने के बाद हम सभी कॉलेज के अपने समर्थक विद्यार्थियों से मिला और अगले दिन के कार्यक्रम के बारे में बताएं।

 

जब मैं और दीपा कोरिडोर के रास्ते से बाहर निकल रहा था तभी देवांशु अपने कुछ दोस्तों के साथ सामने से आकर मेरे सामने खड़ा हो गया।

 

“Congratulation नेता जी। आखिर तुम चुनाव जीत ही गए। वैसे तुम्हारी किस्मत तो बहुत अच्छी निकली , कुर्सी भी मिल गई और छोकरी भी।” देवांशु दीपा की ओर इशारा करते हुए बोला।

 

“भाई जिसके पास इतनी अच्छी आइटम हो लोग उसे वोट तो करेंगे ही” एक दूसरे लड़के ने कहा।

 

“साले आइटम किसे बोला?” मैं उस लड़के के कॉलर पकड़ लिया।

 

“ना नेताजी ना…. ना… ना … ऐसी गलती मत करिएगा। नहीं तो ऐसा हाल करेंगे कि कल शपथ समारोह में नहीं बल्कि श्मशान घाट में रहिएगा।” देवांशु ने कहा।

 

“निशांत…. निशांत प्लीज इसे छोड़ दो। ये लोग मुंह लगाने लायक नही है।”

 

मैं दीपा की बात मानकर उसे धक्का देकर छोड़ दिया।

 

“साले तुम्हें ये लड़ाई बहुत महंगी पड़ेगी”

 

तब तक मैं कुछ बोलता उससे पहले ही वहां पर और भी बहुत सारे लड़के आ गए। वो लोग झगड़े को भापते हुए हमें वहां से अलग कर दिया।

 

कॉलेज में छूटी हो चुकी थी। सभी विद्यार्थी अपने घर जाने के लिए पार्किंग से अपना बाइक निकाल रहे थे।

 

कॉलेज से रिसीव करने के लिए दीपा के भैया भी आ चुके थे। दीपा मुझे बाय कर अपने भैया के साथ घर को निकल गई और मैं भी अपने घर के लिए निकल पड़ा।

 

बाइक से मैं घर जा रहा था। मेरी बाइक की स्पीड नॉर्मल थी। मैं जिस रास्ते से जा रहा था वह रास्ते अक्सर शाम के समय सुनसान हो जाया करता है। उस रास्ते पर इस टाइम कभी-कभार ही कोई गाड़ी पास होती थी। वरना पूरे सड़क खाली रहता था।

 

मैं कुछ सोचता जा रहा था। उसी वक्त आगे से देवांशु और उसके कुछ मित्र बाइक से आकर मेरे आगे सड़क पर बाइक खड़ा कर दिया।

 

उसके द्वारा रास्ते बंद करने के बाद मैं भी अपनी बाइक को रोक दिया। उन लोगों ने अपनी बाइक स्टैंड पर खड़ा कर मेरे पास आया

 

“क्यों बे साले कॉलेज में बहुत हीरो बन रहा था। उस समय तो तेरे साथ छोकड़िया थी अब यहां पर कौन है?” उसके दोस्त ने कहा।

 

“देखो मैं तुम लोगों से झगड़ा करना नही चाहता हूं। मुझे जाने दो। और वैसे भी वह सब कॉलेज की बात थी और मेरा मानना है कॉलेज के झगड़े कॉलेज में होनी चाहिये।”

 

“वाह रे गुरु ! तो तुम्हारा कहना है कि तुम कॉलेज में मुझे कॉलर पकड़ो। मुझे कुछ भी करो और मैं उसका जवाब तुम्हें कॉलेज में ही दूं ताकि तुम्हें बचाने वाले लोग वहाँ मिल जाए।”

 

“तुम लोग इस कमीने से बात क्या कर रहे हो ? मारो साले को” देवांशु ने कहा।

 

इसके बदले में मैं कुछ बोलता उससे पहले ही तीन-चार लड़के आ कर मुझे मारना शुरू कर दिया। उसने बाइक सहित मुझे एक गड्ढे में धक्का दे दिया। उसके बाद जो हुआ मुझे कुछ भी याद नहीं। जब मेरी आंखें खुली तो मैं अस्पताल में था ।

 

मेरे सामने अर्जुन भैया,आदिति भाभी, मां और दीपा खड़ी थी।

 

“बेटा तुम होश में आ गए?” मुझे आंख खुलते ही मेरी मां ने बोली।

 

सभी लोग से मैंने बात किया वह सभी लोग काफ़ी डरे हुए थे । वे  सभी लोग मुझसे जानना चाह रहे थे आखिर यह सब कैसे हुआ।

 

एक-दो घंटे अस्पताल में रहने के बाद डॉक्टर ने हमें यह कह कर डिस्चार्ज कर दिया,”यह एक नॉर्मल एक्सीडेंट थी थोड़ी बहुत चोट लगी है। मगर सर में अचानक चोट लगने के कारण यह बेहोश हो गए थे घबराने की कोई बात नहीं है आप इन्हें घर लेकर जा सकते हैं।”

 

हम लोग सभी घर वापस आ गए थे। मां को लगभग यह सारी बातें जानकारी हो चुकी थी कि झगड़ा हुआ है। कहीं ना कहीं छात्र संघ चुनाव के वजह से हुआ है जिसके कारण मां हमें समझाते हुए बोली,”  निशांत तुम छात्र संघ चुनाव में भले ही अपनी जीत दर्ज कराई हो लेकिन तुम अब इसमें शामिल नहीं रहोगे और नहीं कल तुम शपथ समारोह में जाओगे”

 

“क्यूँ ? अगर मैं नही जाऊंगा तो कार्यक्रम कैसे होगा?”

 

“अगर तुम्हें कॉलेज जाना है तो सिर्फ तुम पढ़ाई के लिए जाओगे वरना यह तुम्हे राजनीतिक-वजनीति करनी है तो कल से कॉलेज जाना बंद और अब भैया के ऑफिस संभालो” मां फैसला करती हुई बोली।

 

“मगर मां…”

 

“देखो मैं और कुछ नहीं सुनना चाहती हूं। बस अगर तुम्हें कल से कॉलेज जाना है तो सिर्फ पढ़ाई के लिए जाओगे वरना कॉलेज नहीं जाओगे”

 

Continue…..

 

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This entry is part 19 of 23 in the series तेरी - मेरी आशिक़ी

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1 Comment

  1. कमाल का काम लिया है आपने अपने जिम्मे। बहुत अच्छा।

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